11दिसम्बर को मनाई जायेगी दत्तात्रेय जयंती

इस साल दत्तात्रेय जयंती 11 दिसंबर को मनाई जायेगी।


इस दिन भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। मान्यताओं अनुसार भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का ही स्वरूप माना जाता है। दत्तात्रेय को श्री गुरुदेवदत्त के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार दत्तात्रेय का जन्म मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को प्रदोषकाल में हुआ था। इन्होंने 24 गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की थी। जानिए इनके जन्म की कथा…
दत्तात्रेय भगवान का स्वरूप: दत्तात्रेय भगवान के तीन सिर हैं और छ: भुजाएं हैं। माना जाता है कि इनके अंदर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों के ही संयुक्त अंश समाहित हैं। दत्तात्रेय जयंती पर इनके बालरुप की पूजा की जाती है। भगवान दत्त के नाम पर ही दत्त संप्रदाय का उदय हुआ। दक्षिण भारत में इनके कई प्रसिद्ध मंदिर भी हैं।
दत्तात्रेय जयंती कथा (Dattatreya Birth Story):
नारद जी 3 देवियों का गर्व चूर करने के लिए बारी-बारी से तीनों देवियों के पास जाते हैं और देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म का गुणगान करते हैं। देवी ईर्ष्या से भर उठी और नारद जी के जाने के पश्चात भगवान शंकर से अनुसूया का सतीत्व भंग करने की जिद करने लगी। सर्वप्रथम नारद जी पार्वती जी के पास पहुंचे और अत्रि ऋषि की पत्नी देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म का गुणगान करने लगे।


देवीयों को सती अनुसूया की प्रशंसा सुनना कतई भी रास नहीं आया। घमंड के कारण वह जलने-भुनने लगी। नारद जी के चले जाने के बाद वह देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म को भंग करने की बात करने लगी। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों को अपनी पत्नियो के सामने हार माननी पड़ी और वह तीनों ही देवी अनुसूया की कुटिया के सामने एक साथ साधु के वेश में जाकर खड़े हो गए। जब देवी अनुसूया इन्हें भिक्षा देने लगी तब इन्होंने भिक्षा लेने से मना कर दिया और भोजन करने की इच्छा प्रकट की।


देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना धर्म मानते हुए उनकी बात मान ली और उनके लिए प्रेम भाव से भोजन की थाली परोस लाई। लेकिन तीनों देवों ने भोजन करने से इंकार करते हुए कहा कि जब तक आप वस्त्रहीन होकर भोजन नहीं परोसेगी तब तक हम भोजन नहीं करेगें। देवी अनुसूया यह सुनते ही पहले तो स्तब्ध रह गई और गुस्से से भर उठी। लेकिन अपने पतिव्रत धर्म के बल पर उन्होंने तीनों की मंशा जान ली।


उसके बाद देवी ने ऋषि अत्रि के चरणों का जल तीनों देवों पर छिड़क दिया। जल छिड़कते ही तीनों ने बालरुप धारण कर लिया। बालरुप में तीनों को भरपेट भोजन कराया। देवी अनुसूया उन्हें पालने में लिटाकर अपने प्रेम तथा वात्सल्य से उन्हें पालने लगी। धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। जब काफी दिन बीतने पर भी ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश घर नहीं लौटे तब तीनों देवियों को अपने पतियों की चिंता सताने लगी।
देवियों को अपनी भूल पर पछतावा होने लगा। वह तीनों ही माता अनुसूया से क्षमा मांगने लगी। तीनों ने उनके पतिव्रत धर्म के समक्ष अपना सिर झुकाया। माता अनुसूया ने कहा कि इन तीनों ने मेरा दूध पीया है, इसलिए इन्हें बालरुप में ही रहना ही होगा। यह सुनकर तीनों देवों ने अपने-अपने अंश को मिलाकर एक नया अंश पैदा किया। इसका नाम दत्तात्रेय रखा गया। इनके तीन सिर तथा छ: हाथ बने। तीनों देवों को एकसाथ बालरुप में दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के चरणों का जल तीनों देवों पर छिड़का और उन्हें पूर्ववत रुप प्रदान कर दिया।