जब बेटी सुरक्षित ही नहीं तो कैसे बचेगी बेटी और कैसे पढ़ेगी बेटी? 

संसद में वीआईपी सुरक्षा की चर्चा करो, महिलाओं की सुरक्षा बेटी बचाओ ,बेटी पढ़ाओं तक सीमित
जब बेटी सुरक्षित ही नहीं तो बेटी बचेगी कैसे और पढ़ेगी कैसे? 
===============================
अनिल बिष्ट


हरिद्वार।वेदों में कहा गया हैं कि यत्र नार्यस्तु पुजयन्ते रमन्ते तत्र देवता अर्थात्ण् जहाँ नारियों को सम्मान दिया जाता है, वहाँ साक्षात् देवता निवास करते हैं । लेकिन संकट का बादल उपेक्षा के साथ इस वेद वाक्य के सच पर हमेशा मंडराता रहता हैं। बीते दिन डाॅक्टर से गैंगरेप के बाद उसकी हत्या और फिर शव को जलाने की संगीन वारदात उसी संकट के मंडराते बादल की बानगी है। हैदराबाद में एक महिला पशु चिकित्सक के दुष्कर्म के बाद उसे जलाकर मार डालने की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। 2012 में हुए निर्भया कांड गैंग रेप ने पूरे देश को झकझोरकर रख दिया था। भारत में सोशल मीडिया के दौर का यह पहला मामला था जिसने जनचेतना मुखर कर दी। डाॅक्टर से गैंगरेप के बाद उसकी हत्या और फिर शव को जलाने की संगीन वारदात ने फिर से निर्भया कांड की यादें ताजा कर दी हैं। इतना ही नहीं पशु चिकित्सक के साथ हुई घटना विरोघ कर रही छात्रा को भी पुलिस ने नहीं बख्शा । युवती को घंटो थाने में बैठाकर टार्चर करना भी इसी ओर इशारा करता हैं कानून व्यवस्था व सुरक्षा वीआईपी के लिए हैं ना कि आम जन के लिए । दोष इतना था कि उसने अहिंसात्मक तरीका अपना घटित घटना का विरोध किया था? वह घटना के खिलाफ थी और अपने साथ-साथ देशभर की महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चितिंत थी । तो इसमें क्या गलत था ? घटना के बाद सड़कों से लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह लोगों में गुस्सा फूट रहा है वो कहीं न कहीं हद तक जायज भी हैं। क्योंकि आए दिन महिलाओं के साथ बालात्कार, हत्या जैसी घटनाओं में वृद्धि के चलते महिलाएं अपने आपकों असुरक्षित महसूस करने लगी हैं। महिला पशु चिकित्सक के दुष्कर्म के बाद उसे जलाकर मार डालने की घटना ने महिलाओं  की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। कानून कितना लचर हैं सिस्टम कितना लापरवाह हैं? इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता हैं कि मामले की शिकायत दर्ज करने के स्थान पर पुलिस मामले को इधर से उधर भटकाती रही । विडम्बना यह हैं कि जिन माननीयों को इस सुरक्षा संबंधी विषयों पर गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए वो माननीय बेटी बचाओं , बेटी पढ़ाओं का नारा देकर अपनी जिम्मेदारियों से इती श्री कर संसद में वीइआईपी सुरक्षा के विषय पर गंभीर नजर आते हैं। लानत हैं ऐसे माननीयों पर और लानत हैं ऐसे सिस्टम पर जिन्हें आमजन से ज्यादा खास की पड़ी हैं । इन हालतों में बेटी सुरक्षित ही नहीं हैं तो बेटी बचेगी कैसे ? और पढ़ेगी कैसे ? इस तरह की घटनाओं के पश्चात् यह सवाल उठना लाजमी हैं?