विश्व पुस्तक दिवस (२३अप्रैल) पर विशेष-
[ प्राचीन भारतीय ग्रंथों की वर्तमान में प्रासंगिकता]
*डॉ. अनिल शर्मा'अनिल'
आज विश्व पुस्तक दिवस है । प्रतिवर्ष २३ अप्रैल को यह दिवस मनाया जाता है। कहा जाता है कि पुस्तकें मानव की सच्ची साथी होती है।
हमारे पूर्वजों ने जो ज्ञान अर्जित किया वह सब पहले गुरु शिष्य परंपरा में श्रुति के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा। कालांतर में जब श्रुति परंपरा, लुप्त होने लगी तो उस ज्ञान को लिखने का प्रचलन हुआ। उसे लिखित रूप में हस्तलिखित पुस्तकों के रूप में, पांडुलिपि के रूप में रखा जाने लगा।
बाद में मुद्रण की तकनीक विकसित होने के साथ साथ वह ज्ञान पुस्तकों के माध्यम से संरक्षित होकर अगली पीढ़ी को मिलता रहा।आज इंटरनेट के युग में इसका स्वरुप परिवर्तित हो रहा है ई बुक के रुप में। लेकिन इससे पुस्तक का महत्त्व कम नहीं होता,वरन और भी विस्तृत हो जाता है। एक विचार जो अब तक एक व्यक्ति के मस्तिष्क में था, वह पुस्तक के रूप में, ई बुक के रूप में आने पर तुरंत संपूर्ण विश्व में फैल जाता है, और संपूर्ण मानवता उससे लाभान्वित होती है ।
विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर वर्तमान समय में पुस्तकों के महत्व की चर्चा करते हुए हमें यह विचार करना चाहिए कि आज विश्व में कोरोना के रूप में जो संकट आया हुआ है उससे निबटने में हमारा आयुर्वेद सक्षम है।हमारा योग संकर्षण है। हमारी सरकार ने भी आयुर्वेद के नुस्खों को,योग को अपनाने और कोरोना की बीमारी से बचने का आह्वान किया है। विचार करें यदि यह नुस्खे आज पुस्तक के रूप में, ग्रंथों के रूप में संरक्षित न होते तो हम तक कैसे पहुंचते।
यह विश्व को हमारे भारतवर्ष की बहुत बड़ी देन है।
इसी प्रकार बढ़ते प्रदूषण और बिगड़ते पर्यावरण संतुलन को कोई यदि बचाए रखना है तो प्राचीन भारतीय मनीषा और ग्रंथों से प्रेरणा लेकर हमें जल, जंगल,जंतुओं का संरक्षण अपने जीवन के लिए करना ही होगा।
यह एक-दो दिन में प्राप्त ज्ञान नहीं है। इसके लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्षों तक तपस्या की और ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त किया है। जिसके बल पर संपूर्ण मानव समाज सुखी रह सकता है। भौतिक विकास के नाम पर जिस प्रकार प्रकृति का अंधाधुंध शोषण किया गया पूरे विश्व में, जो विकसित देशों के रूप में हमारे सामने है। आज जरा सी महामारी की चपेट में आने पर जार जार आंसू रो रहे हैं। नहीं रोक पा रहे उसको, नहीं खोज पाए उससे बचने का कोई उपाय। ऐसे समय में भारतीय ग्रंथ काम आ रहे हैं, जिनमें वर्णन है सफल जीवन शैली का, स्वच्छ और सुंदर पर्यावरण को बचाए रखने का। जिसमें नदियों को माता माना गया। वृक्षों,पहाड़ों खेतों, जीव जंतु सभी के महत्व को समझते हुए उनके प्रति आदर और सम्मान का भाव रखते हुए उनको देवता का दर्जा दिया गया।
यह हमारे ग्रंथों की महानता है जो हजारों हजारों वर्ष भी जाने के बाद भी वर्तमान समय में प्रासंगिक हैं । संपूर्ण विश्व को राह दिखा रहे हैं। मानवता और सुखी जीवन की।
आज विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर यह बहुत ही गौरव की बात है विश्व की प्राचीनतम पुस्तक वेद,योग,दर्शन हमारे इस भारतवर्ष की भूमि पर ही अवतरित हुए जो श्रुति परंपरा से चलते हुए,गुरु शिष्य परंपरा में चलते हुए बाद में लिपिबद्ध किए गये। वो आज हमारी अनमोल धरोहर है।
संपूर्ण विश्व इस समय भारत की ओर ताक रहा है इंटरनेट पर भारत के पौराणिक ग्रंथों की, भारत के आयुर्वेदिक के ग्रंथों की,योग दर्शन के ग्रंथों की तलाश की जा रही है। पढ़ा जा रहा है और जीवन को सहज रूप से जीने के कुंजी की तलाश की जा रही है। वह कुंजी जो हमारी प्राचीन परंपरा में हमारे ऋषि-मुनियों ने इन ग्रंथों में संरक्षित की है।
भारतीय साहित्य की प्रासंगिकता इन दिनों इसलिए भी बढ़ जाती है की भारत विश्व का एक मात्र देश है जहां विभिन्न धर्म संस्कृति और जातियों के लोग एक साथ मिलकर रह रहे हैं और एक साथ रहते हुए कोरोना जैसी महामारी से बचने के लिए उन उपायों को अपना रहे हैं, जिन्हें हमारे प्राचीन ग्रंथों में दैनिक नित्यक्रम में स्थान मिला हुआ है। संपूर्ण विश्व को भारतवर्ष इस विषम परिस्थिति में नेतृत्व प्रदान कर रहा है हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने जो घंटे,शंख,थाली बजाये जाने और दीप प्रज्ज्वलित करने के कार्यक्रम कराएं वह भी महामारी से लड़ने की दिशा में भारतीय ग्रंथों में उपलब्ध उपाय है।
विश्व पुस्तक दिवस पर वर्तमान स्थिति में यह विचार करना बहुत आवश्यक है कि हम अपने प्राचीन भारतीय साहित्य का संरक्षण और संवर्धन करने की दिशा में अवश्य विचार करें। जिससे भारत संपूर्ण विश्व को मार्गदर्शन देते हुए विश्व गुरु पद प्राप्त करें। वर्तमान वैश्विक महामारी के संकटकाल में तो विश्व के सब देश भारत के पीछे है ही।
डॉ अनिल शर्मा'अनिल',
धामपुर उत्तर प्रदेश
विश्व पुस्तक दिवस (२३अप्रैल) पर विशेष- [ प्राचीन भारतीय ग्रंथों की वर्तमान में प्रासंगिकता]